पता नहीं कैसे
बची रह गई थी मेरे बचपन की
वह गुल्लक
अर्से से छेड़ी जाती कोख लिए
घर के अंधेरे कबाड़ में पड़ी थी चुपचाप
टूटी नहीं थी आज तक यही आश्चर्य है
भरे पड़े हैं घोर आश्चर्य
इस घिस-घिस जाती दुनिया में
अब लें उस दिन बेटे की टिन की गुल्लक देख
मुझे याद आई अपनी गुल्लक
जो ढूंढी तो मिल भी गई तपाक से-
सोचा कि मुक्त करूं इसे, और
जैसे पिछले साल कंचे दिए थे बेटे को
सिक्के भी दूं, यूं ही
फटी-फटी आंखों से निहारता सिक्के
किसी दूसरी दुनिया का लगा बेटा
थूक से उठाया उसने फिर
इक पैसे का सिक्का
माथे के बीचोबीच बिंदिया-सा चिपका लिया
लगा रहा दो-पैसे, तीन-पैसे के कई-कई
गुलीवरी अजूबों से
इस सदी में सहेज तो लेगा वह भी
अपनी टिन की गुल्लक जरूर
और इसकी संतान भी यूं ही चिपकाएगी कभी
कोई ऐसा ही, मूल्य खो चुका सिक्का।
बची रह गई थी मेरे बचपन की
वह गुल्लक
अर्से से छेड़ी जाती कोख लिए
घर के अंधेरे कबाड़ में पड़ी थी चुपचाप
टूटी नहीं थी आज तक यही आश्चर्य है
भरे पड़े हैं घोर आश्चर्य
इस घिस-घिस जाती दुनिया में
अब लें उस दिन बेटे की टिन की गुल्लक देख
मुझे याद आई अपनी गुल्लक
जो ढूंढी तो मिल भी गई तपाक से-
सोचा कि मुक्त करूं इसे, और
जैसे पिछले साल कंचे दिए थे बेटे को
सिक्के भी दूं, यूं ही
फटी-फटी आंखों से निहारता सिक्के
किसी दूसरी दुनिया का लगा बेटा
थूक से उठाया उसने फिर
इक पैसे का सिक्का
माथे के बीचोबीच बिंदिया-सा चिपका लिया
लगा रहा दो-पैसे, तीन-पैसे के कई-कई
गुलीवरी अजूबों से
इस सदी में सहेज तो लेगा वह भी
अपनी टिन की गुल्लक जरूर
और इसकी संतान भी यूं ही चिपकाएगी कभी
कोई ऐसा ही, मूल्य खो चुका सिक्का।
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